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मंगलवार, 15 मई 2012

मृत्युञ्जयी सरदार पटेल



"आज सरदार पटेल का जन्म-दिवस है---अविस्मरणीय राष्ट्र-निर्माता का प्रेरक स्मरण दिवस ! सरदार मृत्युंजय साबित हुए हैं | जीवन में वह जितने याद नहीं आए, उससे कई गुना अधिक वह आज याद आ रहे हैं| राष्ट्रविपत्ति में लोगों की आँखों में अनायास ही सरदार की वज्रमुर्ती चित्रित हो जाती है | द्रोह और शैथिल्य की स्थितियों में वज्रबाहु सरदार आँखों की श्रद्धा में झूलने लगते हैं | संकट-काल में जिसकी याद आए , जिसकी अनुपस्थिति मन में मायूसी उत्पन्न करे, उसे मृत्युंजय न कहें तो क्या कहें ?

                    सरदार पटेल ने भारत की भाग्यालिपि अपनी लौह-कर्मठता में लिखी है | वह लिपि देश का अखण्ड-अनश्वर भूगोल बन कर उनके नेत्रित्वकौशल  का जयजयकार करती है | गांधीजी ने राष्ट्र-जागरण का जो शंख फूंका था, सरदार ने उस घोष को अपने जीवन में प्रवृति-रूप देकर राष्ट्र की विविध -मुखी शक्तियों को एक प्रबल प्रवाह में संगठित किया था | इस प्रवाह में इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य ही नहीं बह गया , देश की अकर्मण्यता और हीनताएं भी बह गई | शक्तिस्त्रोत से निकले शक्ति-प्रवाह राष्ट्र की रंगों में प्रवाहित हो कर निर्जीव-मूल्यों को फिर से लहलहाने लगे | मुक्ति के विचार-आकाश  के साथ  सरदार ने अपनी मातृभूमि को ऐसे नर-रत्न भी गढ़ कर दिए, जिन्होंने अपने प्रशासन-कौशल  से संसार को चकित कर दिया | सरदार स्वाभाव से सेनापति तो थे ही, वे अपने उसी स्वाभाव में सेनापति निर्माता भी थे | महादेव भाई उन्हें मजाक में अक्सर "नेताओं की फसल बोने वाला किसान" कहा करते थे |

                    जीवन काल में कमायी महत्ता और कीर्ति, वास्तव में परम काम्य है, किन्तु अक्षय अमर महत्ता तो वही है जो मृत्यु के बाद भी फलती फूलती रहे | पुरुषार्थियों को ही ऐसी महत्ता और कीर्ति नसीब होती है ----ऐसे पुरुषार्थियों को, जिन्होंने काल के वज्रदान्तों को अपने प्रचंड पराक्रम से तोड़ा है | सरदार पटेल इसी कोटि के पुरुष-पुंगव थे-----उनकी सिर से पैर तक की सारी देह यष्टि शौर्य के स्वर्ण से बनी थी | अग्नि परीक्षाओं में यह स्वर्ण और भी निकलता गया | कीर्ति के लिये मृत्यु सब से भयानक एवं कठोर अग्नि परीक्षा होती है | सरदार इस परीक्षा में भी खड़े उतरे हैं; मृत्यु के बाद वह अपने 'स्वर्ण ' में और भी तेजस्वी होते जा रहे हैं | आज देश उन्ही अद्वितीय 'सरदार' को श्रद्धा-भक्ति के साथ शीश नवाता है |"


साभार-----दैनिक "हिन्दुस्तान"
अक्टूबर
दिनांक-----31 अक्टूबर 1963